भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय महोत्सव में ओल चिकी लिपि, जनजातीय कला, पारंपरिक वेशभूषा और लोकसंगीत पर केंद्रित कार्यक्रम
नई दिल्ली, 28 सितंबर 2026: कबीला फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत ओल चिकी अंतरराष्ट्रीय महोत्सव 26 और 27 सितंबर को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर में आयोजित हुआ। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से हुए इस दो दिवसीय महोत्सव का प्रबंधन Xeel Events ने किया।
‘लिपि | लोग | संस्कृति | एक साझा कल’ की थीम पर आयोजित महोत्सव ने ओल चिकी लिपि को जनजातीय कला और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के साथ एक मंच पर रखा। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को इस विरासत से परिचित कराना तथा उन कलाकारों और समुदायों के काम को सामने लाना था जो इसे सहेज रहे हैं।
ओल चिकी लिपि को पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में संथाली भाषा के लिए विकसित किया था। लिपि की शताब्दी के अवसर पर देश में उसके भाषाई और सांस्कृतिक महत्व पर नए सिरे से चर्चा हो रही है। इसी संदर्भ में महोत्सव ने दर्शकों को कार्यशालाओं, साहित्यिक संवाद और प्रस्तुतियों के माध्यम से ओल चिकी तथा जनजातीय परंपराओं से जुड़ने का अवसर दिया।
पहले दिन के कार्यक्रम में विद्यार्थियों के लिए जनजातीय कला कार्यशाला, ओल चिकी पुस्तक पर परिचर्चा और लिपि की यात्रा पर दृश्य-श्रव्य प्रस्तुति शामिल रही। प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। शाम के कार्यक्रम में हेरिटेज गार्डियंस अवॉर्ड के साथ नीरज आर्य, प्रमोद और साहिल तथा Mantash Band की संगीत प्रस्तुतियां रखी गईं।
कबीला फाउंडेशन के संस्थापक विजय रावत ने कहा, “ओल चिकी में एक समुदाय की भाषा, कहानियां और पहचान समाई हुई हैं। इस महोत्सव के माध्यम से हम युवाओं को उस विरासत से जोड़ना चाहते थे जिसे कई पीढ़ियों ने संभालकर रखा है। कला और संवाद लोगों को इसे समझने का अवसर देते हैं।”
दूसरे दिन के कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों की जनजातीय और लोक वेशभूषा का प्रदर्शन, संगीत, नृत्य और नाटक के माध्यम से पंडित रघुनाथ मुर्मू की विरासत को समर्पित प्रस्तुति, हेरिटेज गार्डियंस अवॉर्ड और लोकसंगीत समारोह शामिल रहे। इन कार्यक्रमों ने महोत्सव के मूल विचार जैसे लिपि, लोगों और संस्कृति के बीच संबंध को अलग-अलग रूपों में सामने रखा।
Xeel Events के संस्थापक हिमांशु राजपूत ने कहा, “हमने कार्यक्रम को इस तरह तैयार किया कि दर्शक जनजातीय विरासत को कई रूपों में अनुभव कर सकें। विद्यार्थियों की कार्यशाला से लेकर परिधान और संगीत की प्रस्तुतियों तक, हर कार्यक्रम लोगों को इस संस्कृति के और करीब लाने का प्रयास था।”
दो दिवसीय महोत्सव ने ओल चिकी लिपि और जनजातीय सांस्कृतिक पहचान पर संवाद के लिए एक साझा मंच प्रदान किया।









