विकसित हुआ अस्थि-ऊतकों के पुनर्निर्माण में सहायक नया बायोमैटिरियल

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New biomaterial helpful in rebuilding bone tissue developed
डॉ गीतांजलि

नई दिल्ली: एक नए शोध से हड्डी के ऊतकों के पुनर्निर्माण (टिशू रीजेनरेशन) का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। पुणे स्थित सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय में संकाय फेलो डॉ. गीतांजलि तोमर का यह शोध रीजेनरेटिव थेरेपीज (पुनरोत्पादन उपचार पद्धतियों) को लेकर बोन टिशूज के लिए दवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक कदम है।

इस अध्ययन में एक नैनो बायोमैटीरियल को दो अणुओं या हाइड्रोक्सीपेप्टिट-पैराथिरोइड नाम के हार्मोन नैनोकोन्जुगेट के बीच एक स्थायी कड़ी जोड़ी गई है। डॉ. तोमर ने स्वर्ण नैनोपार्टिकल्स(AuNPs) को भी संश्लेषित किया है। यह संश्लेषण एक्टिनोमासेट्स नाम के सूक्ष्मजीव से किया गया है।

इसमें पहला वाला शोध ‘नैनोमेडिसिनः नैनोटेक्नोलॉजी, बायोलॉजी एंड मेडिसिन’ (एनबीएम) में प्रकाशित हुआ है जबकि स्वर्ण नैनोपार्टिकल्स संश्लेषण से संबंधित शोध काप्रकाशन‘एप्लाइड माइक्रोबायोलॉजी एंड बायोटेक्नोलॉजी’ में हुआ है। इससे रीजेनरेटिव थेरेपीज के लिए नैनोकरियर सिस्टम के विकास की संभावनाएं जगी हैं।

डॉ. गीतांजलि ने प्रयोगशाला में ऊतक पुनर्निर्माण के लिए उपयुक्तता की दृष्टि से स्टेम सेल्स की विशिष्टताओं का अध्ययन किया। साथ ही साथ उन्होंने कुछ क्रिटिकल बोन डिफेक्ट्स को लेकर उपचार के लिए सामग्री तलाशने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।

मानव खोपड़ी और चेहरे की हड्डियों (क्रैनियोमैक्सिलोफेशियल हड्डी) ऊतक इंजीनियरिंग से जुड़ा उनका शोध हाल में प्रकाशित भी हुआ है। अपने कई आलेखों में से एक में उनकी टीम ने नवोन्मेषीएवं बहुविषयक दृष्टिकोण को रेखांकित किया है। इसमें एडवांस्ड मैटीरियल्स, नैनोबायोटेक्नोलॉजी, सेल बायोलॉजी, कंप्यूटर असिस्टेड टेक्निक्स, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स जैसे विकल्प शामिल हैं, जो क्रैनियोमैक्सिलोफेशियल इंजीनियरिंग के विकास में संभावनाओं की राह खोलते हैं।

इस प्रयोगशाला को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा प्राप्त फेलोशिप से सहायता मिली है। यह भारत की उन चुनिंदा प्रयोगशालाओं में से एक है जो दांत के एकदम नजदीक स्थित मसूड़ों पर केंद्रित स्टेम सेल्स को लेकर शोध कर रही है। तकनीकी भाषा में इसे ह्यमुन जिंजिवा कहते हैं। अपने अभी तक की उपलब्धि से उत्साहित डॉ. तोमर अब पुणे के आसपास स्थित प्रयोगशालाओं के साथ सहभागिता के विकल्प तलाश रही हैं ताकि स्टेम सेल्स थेरेपीज के व्यावसायीकरण की दिशा में सुविधाएं विकसित कर सके।

डॉ गीतांजलि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की एक महिला वैज्ञानिक विंग (डब्ल्यूओएस-बी)में कार्य कर रही हैं। उन्होंनेकोशिकाओं का सह-संवर्धन करके अस्थि मज्जा की प्रतिकृति बनाने के लिए एक बहुलक (पॉलीमर) प्रणाली विकसित की है।वर्तमान में वहहाइड्रोजेल-आधारित सेल-सीडेड स्कैफोल्ड्स के तकनीकी विकास पर काम कर रही हैं।इस तकनीक के लिए उन्होंने पेटेंट की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। (इंडिया साइंस वायर)

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