“डेटा की समझ और उसके नियंत्रण में छिपी हैं भविष्य की संभावनाएं”

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नई दिल्ली:  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) या कृत्रिम बुद्धिमत्ता अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में शामिल हो रही है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का आरंभ तो है, पर इसका कोई अंत नहीं है। उन्होंने कहा है कि यह तकनीक समय के साथ विकसित होती रहेगी। ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐंड फ्यूचर ऑफ पावर’ विषय पर केंद्रित एक व्याख्यान के दौरान प्रोफेसर शर्मा ने यह बात कही है।

डीएसटी की गोल्डन जुबली व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत यह व्याख्यान राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद (एनसीएसटीसी) और विज्ञान प्रसार द्वारा आयोजित किया गया है। इस ऑनलाइन व्याख्यान में  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की उभरती संभावनाओं को रेखांकित किया गया है। प्रोफेसर शर्मा ने डेटा की सही समझ और नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि डेटा के बारे में समझ और उस पर नियंत्रण होने से भविष्य में भारत इन संभावनाओं का लाभ उठा सकता है।

प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा है कि “आज डेटा कच्चे माल की तरह है, और हमें इसका सम्मान करना चाहिए। डेटा की सही समझ, डेटा को साझा करना और डेटा को नियंत्रित करना आवश्यक है।” उन्होंने कहा कि भविष्य मुख्य रूप से प्रौद्योगिकियों के एकीकरण (Integration) और रूपांतरण (Conversion) पर केंद्रित होगा। प्रोफेसर शर्मा ने बताया कि डीएसटी पिछले काफी समय से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में विचार कर रहा है। इस दिशा में कार्य करते हुए साइबर फिजिक्स पर राष्ट्रीय मिशन के तहत देश के विभिन्न क्षेत्रों में 25 अलग-अलग हब बनाए गए हैं।

इन्फिनिटी फाउंडेशन के संस्थापक एवं ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐंड दि फ्यूचर ऑफ पावर’ के लेखक राजीव मल्होत्रा ने भी इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यूनिवर्स, आर्थिक विकास एवं नौकरियां, ग्लोबल पावर, एवं तत्वविज्ञान जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नौकरियों से लेकर, रक्षा, और भविष्य के शिक्षा तंत्र समेत समाज के हर क्षेत्र को व्यापक रूप से प्रभावित करने जा रहा है। एआई ऐप्लिकेशन्स की संख्या बेहद अधिक है, और भविष्य की बागडोर अब इसी के हाथ में होगी।”

राजीव मल्होत्रा ने कहा कि भारत को एआई के क्षेत्र में अपनी प्रगति को तेज करने की जरूरत है। अपने डेटा एवं मेधा का निर्यात करने के बजाय भारत को उत्पादों के निर्माण में इसका उपयोग सुनिश्चत करना चाहिए। इसी से, अंततः आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त होगा। (इंडिया साइंस वायर)

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